हिन्दू-मुस्लिम की तकरार #राजनीति में मुद्दे का शिकार

hindu muslim

सन् 1947 में जब देश आज़ाद हो रहा था तो उससे कुछ वर्षों पहले ब्रिटिशरों द्वारा एक बहुत ही गिरा हुआ कार्य किया गया, वह था हिन्दू-मुस्लिम में फूट डालने का कार्य। यह कार्य इतना दोषपुर्ण था कि इसकी वजह से देश का विभाजन हो गया। जिस देश में हिन्दू-मुस्लिम दो भाइयों की तरह रहा करते थे, वहीं भाई एक-दूसरे के खून के प्यासे हो गए। परन्तु यह काम अंग्रेजों ने एक दिन में नहीं किया था बल्कि इसके लिए उन्हें कई वर्ष लग गए थे।

बंटवारे के समय सारे मुस्लिम पाकिस्तान में नहीं गए थे बल्कि उन्हें तो पता भी नहीं चला था कि पाकिस्तान नाम का कोई मुल्क भी बन गया है। इसी वजह से आज भी भारत में 14.2 प्रतिशत(2011 की जनसंख्या गणना के अनुसार) मुस्लिम आबादी रहा करती है। और इसी वहज से इस आबादी को अल्पसंख्यकों का दर्ज़ा प्राप्त है। अल्पसंख्यक होने के बावज़ूद भी यह आबादी भारतीय राजनीति में हस्तक्षेप करने के लिए परिपूर्ण है।

मुस्लिम वोटों द्वारा कहीं का उम्मीदवार जीत भी सकता है और हार भी सकता है। इसलिए राजनीति में मुस्लिम जनसंख्या अपना पूरा महत्व रखती है। बल्कि यह कहना कदापि अनूचित नहीं होगा कि राजनीति की ही वजह से आज देश की यह स्तिथि हुई है।

बल्कि आज तो हालात यह है कि हिन्दूओं और मुस्लिमों का मुद्दा ही राजनीति का मुद्दा बना लिया जाता है। और इसके बहुत से समसामयिक उदाहरण आज पूरे विश्व के समक्ष है। फिर अपनी बात को पुख्ता करने के लिए मैं एक उदाहरण ज़रूर दूंगा। यह उदाहरण राम मंदिर और बाबरी मस्ज़िद का है जिसके नाम पर आज दोनों ही पक्षों (पार्टियों) में बहुत ही ज़्यादा तकरार बनी हुई है।

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