नष्ट हो रही पुरानी हिंदी फिल्में, जो है भारतीय कला चेतना की पहचान।

old hindi film

तकनीक और हाथ के बीच हम अभी तक कोई दरगाह कालीन या शुभ संगत रिश्ता नहीं बना पाए हैं। आधुनिक तकनीक नई तरकीबें तो बताती है पर खुद ही सुरक्षित और संरक्षित नहीं कर पाती। पिछले दिनों बीबीसी ने विदेशी भाषाओं में बनी 200 सर्वश्रेष्ठ फिल्मों की सूची जारी की जिसमें आमिर खान की फिल्म लगान और मदर इंडिया शामिल थी,

पिछले महीने मुंबई में हुए एक फिल्म समारोह में इस पूरी गंभीरता से फिल्म सचिव को ध्यान दिलाया गया की फिल्म से संबोधित सरकारी संस्थान साथ उन्हें ऐसी समस्त फिल्मों का संरक्षण करना चाहिए जैसे भारतीय कला चेतना की पहचान प्रतिष्ठा पूरी दुनिया में बनी रहे, समारोह में संरक्षण की ओर ध्यान खींचने के उद्देश्य बनाया गया और बताया गया कि सत्यजीत राय राजेश खन्ना की फिल्में जो नष्ट हो रही हैं इनको मूल रूप से नष्ट ना होने दिया जाए

फिल्मों के मुख योग हिंदी में सारी फिल्में हम लगभग खो चुके हैं हम एक भी मूर्ख फिल्म अब हमारे पास नहीं है दुखद नहीं यह दुर्भाग्यपूर्ण और शर्मनाक है मुंबई समारोह में एक कांड जयराज की फिल्मों का बनाया गया ताकि लोगों की दादा साहब फाल्के सैमसंग 19 सौ से लेकर 1912 तक मोबाइल में बनाई गई थी पर 1913 से 1930 तक बांग्ला में भी एक फिल्म भारतीय संग्रहालय राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम के पास नहीं है

करीब 10 साल पहले जब कुमार साहनी ने अडूर गोपालकृष्णन की फिल्में की बात कही थी तब भारत जाकर मणि को संरक्षण दिया नहीं पुरानी फिल्मों का शोषण के मामले में आधुनिक तकनीक से लेकर कोई समस्या नहीं है नई शर्तें यानी पिछले 18 साल में एक कोशिश की गई है की इन फिल्मों को सूचित किया जाए फिल्मों की तरह देश के अन्य कलाओं का संरक्षण का भी यही हाल है।

खुदाई में पाए जाने वाली मुद्रा या स्थाई दृष्टि से महत्वपूर्ण प्राचीन बातों को संग्रहालय के नियमानुसार पहले के करीब के स्थानीय संग्रहालय में सफाई के बाद रखा जाता है फिर उनके विधिवत संरक्षण की व्यवस्था की जाती है उनकी सुनिश्चित महत्व सारणी के अनुसार उनके निर्धारित संग्रहालय में की जाती है। इन सभी सरकारी कला संग्रहालय के हालात आधुनिक तकनीक की दृष्टि से फिल्मों को संग्रह करने के लिए ना तो सरकार अनुदान देती है ना ही इसका कोई उपाय कर दिया अगर ऐसा रहा तो हम अपनी पुरानी संस्कृति को देंगे।