इंदिरा गाँधी के जनाजे पर राजीव गाँधी और राहुल गाँधी की कलमा पढ़ने वाली वायरल तस्वीर का सच

बात कुछ ऐसी है की हाल ही में सोशल मीडिया में क पुरानी तस्वीर वायरल हुई, जिसमे राजीव गाँधी और राहुल गाँधी किसीके जनाजे के सामने कलमा पढ़ते हुए और पीछे सोनिया गाँधी, नरसिंह राव भी दिखाई दिए, उस तस्वीर इस दावे के साथ शेयर किया गया, जिस जनाजे के सामने वो कलमा पढ़ रहे हैं वो इंदिरा गाँधी का जनाजा है।

शेयर किये गये तस्वीर में लिखा टेक्स्ट 
“इन्दिरा जी की शव के सामने राहुल और राजीव गांधी कलमा पढ़ रहे हैं फिर भी हमारे देश के लोगों को लगता है कि ये लोग ब्राह्मण हैं…”

Well! ये तो था उन लोगों का कहना जिन्होंने इस तस्वीर को शेयर किया, पर सच तो कुछ और ही है, कहते है आज कल के ज़माने में आंखे मूंदकर किसीपर भरोसा करना, मतलब बेवकूफी करना। फिर चाहे वो बात किसी के भी द्वारा की गयी हो। बिना तथ्य के किसी भी बात का कोई उपयोग नहीं है।

क्या है वायरल तस्वीर का सच :

दरसल वायरल पोस्ट में जो तस्वीर दिखाई दे रही है, वो बिलकुल सच है पर उसके साथ जो लिखा गया है वो झूट है, जिस शव को इंदिरा गाँधी का बताया जा रहा है वो दरसल अब्दुल गफ्फार खां (Abdul Ghaffar Khan) का है, जिनका जन्म पेशावर, पाकिस्तान में हुआ था, पर उन्होंने भारत माँ के सेवा के लिए अपना जीवन लगा दिया।

अब्दुल गफ्फार खां (Abdul Ghaffar Khan):

अपनी मिशनरी की पढाई पूरी करने के बाद वो अलीगढ़ गए, पर किसी परेशानियों की वजह से उन्होंने अपने गांव में ही रहना पसंद किया, गर्मी की छुट्टियों में वो अपना समय समाज सेवा को देते थे, और अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने अपना सारा वक्त देश सेवा को लगा दिया।

1919 में आये एक फौजी कानून के चलते उन्हें गिरफ्तार किया गया, जहा उनका सम्पर्क अन्य देशभक्तों से हुआ और उन्हें  सिख और हिन्दू धर्म ग्रंथो का अध्ययन करने का अवसर मिला,गांधीजी के प्रभाव से उन्होंने अपने प्रदेश में “खुदाई खिदमतगार” संघठन बनाया और युद्धप्रिय पठानों को अहिंसा के मार्ग में चलने का रास्ता दिखाया और वो उसमे सफल भी हुए। इसी कारण यह “सीमांत गांधी” के नाम से जाने जाते है।

खुदाई खिदमतगार :-

बादशाह खान एक ऐसे भारत की स्थापना चाहते थे जो आज़ाद और धर्मनिरपेक्ष हो। इसी लक्ष्य को हासिल करने के लिए उन्होंने ‘खुदाई खिदमतगार’ नामक संगठन बनाया जिसे ‘सुर्ख पोश’ भी कहा गया। खुदाई खिदमतगार की स्थापना महात्मा गाँधी के अहिंसा और सत्याग्रह जैसे सिद्धान्तों से प्रेरित होकर की गयी थी। संगठन में लगभग 100000 सदस्य शामिल हो गए और उन्होंने शांतिपूर्ण तरीके से अंग्रेजी पुलिस और सेना का विरोध करना शुरू कर दिया, ये बादशाह खान के करिश्माई नेतृत्व का कमाल ही था कि, उनके अनुयायी इतने शांति पूर्ण तरीके से युद्ध करते थे।

1937 के चुनाव में उनके प्रभाव से ही पश्चिमोत्तर प्रांत में कांग्रेस को विजय प्राप्त थी और उनके भाई डॉ.खान साहब वहाँ के पहले मुख्यमंत्री बने। अब्दुल गफ्फार खां (Abdul Ghaffar Khan) की गणना देश के कई बड़े नेताओं  में की जाती है। वे कांग्रेस की निति निर्धारक कार्यसमिति के सदस्य भी रहे। लोग उन्हें आदर और स्नेह से  “बादशाह खान” या “बाचा खान” के नाम से संबोधित करते थे।

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जिन्ना की देश विभाजन की निति का उन्होंने हमेशा विरोध किया, जब देश बटवारा हुआ तो उस समय उन्होंने कहा था कि “मुझे भेड़ियों के बीच डाल दिया गया है”,विभाजन के बाद जब उनका प्रदेश पाकिस्तान में सम्मिलित कर दिया गया तो बादशाह खा ने अलग “पखतुनिस्तान” की स्थापना के लिए अंदोलन चलाया। इसके लिए उन्हें अपने जीवन के लगभग 40 वर्ष पाकिस्तान की जेलों में बिताने पड़े।

आखरी वक्त :

1988 में जब उनका देहांत हुआ तो उनकी इच्छा का सम्मान करते हए उनका शव पाकिस्तान के बदले अफगानिस्तान की भूमि में दफनाया गया।  उनकी देशभक्ति और देश सेवाओं के सम्मान में भारत सरकार ने अब्दुल गफ्फार खां (Abdul Ghaffar Khan) को “भारतरत्न” की उपाधि से सम्मानित किया।

सोशल मीडिया पर वायरल पोस्ट:

जिस तस्वीर को लोग इंदिरा गाँधी का शव की तस्वीर कहकर पोस्ट कहकर, पोस्ट क्र रहे है, दरसल वो जनाजा भारतरत्न अब्दुल गफ्फार खां (Abdul Ghaffar Khan) का है, उन्हीके जनाजे पर जब राजीव गाँधी, राहुल गाँधी, सोनिया गांधी, नरसिंह राव गए थे, और वो वहाँ उन्हींके जनाजे पर कलमा पढ़ा रहे थे, तस्वीर वही है बस कैप्शन बदलकर पोस्ट कर दिया। यकीन ना हो तो, गूगल इमेज सर्च इंजीन पर सर्च कर लीजिये, सच पता चल जायेगा।

जाते जाते बस कहना इतना ही है कि, पार्टी चाहें कोई भी हो। राजनीती यार सच के दम पर करों। जनता सब समझती है, आज नहीं तो कल सच को ढूंढ ही लेती हैं।

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