कहानी उत्तर प्रदेश की शबनम की, रूह को झंझोड़ देने वाली

उत्तर प्रदेश के शबनम ( Shabnam ) की कहानी 

कहते हैं प्यार इबादत होता है, किसीको हंसी, ख़ुशी, सुकून देने का एहसास होता है, पर जो किसीकी जान के क़ीमत में मिले, वो कैसा प्यार होता है ? और अगर मिले भी तो क्या वो प्यार कहलाता है, क्योंकि ना तो वहा सुकून होता है और ना ही ख़ुशी, प्यार के नाम पर अगर कोई इंसान किसीकी जान लेने तक की सोच सकता है, फिर तो ना वो इंसान कहलाने के लायक होता है, ना ही किसिको प्यार करने के और ना ही किसीका प्यार पाने के लायक होता है.

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आप सोचोगे, अचानक मैं ये सब कुछ क्यों बोल रही हू, इसके पीछे भी वजह है, क्योंकि हमारे समाज में आज भी कुछ ऐसे लोग है जिन्हे इतनी सीधी सी बात समझ में नहीं आती की औरों की जिंदगी उनकी जहांगीर नहीं होती, और किसी की जिंदगी उजाड़कर अपनी बसाई नहीं जाती. और बेशर्मी की सारी हदें तो तब पार होती है, जब प्यार जैसे पवित्र रिश्तें की दुहाई देकर अपनों की ही जान ली जाती हैं.

साज़िश मौत की :-

जी हाँ, बिलकुल सच कहा मैंने, ये कहानी उत्तर प्रदेश के उस लड़की (शबनम) की है जिसे देश के हर कोर्ट ने बस एक ही सजा सुनाई, फाँसी की, फिर चाहें वो लोअर कोर्ट हो, higher court, सुप्रीम कोर्ट यहाँ तक की, राष्ट्रपति द्वारा भी उसकी क्षमा याचिका को ख़ारिज कर दिया गया और उसके फाँसी की सजा बरकार रखी गयी और एक दिन उसे फाँसी देने का ऐलान कर दिया गया पर आखरी मौके पर डेथ वॉरंट पे फाँसी का टाइम और जगह mention ना होने के वजह से फाँसी को कुछ दिनों के लिए रोका गया और इसी बिच शबनम ने अपने बच्चे के अनाथ होने का वास्ता देते हुए फाँसी के फैसले पर फिरसे एकबार विचार विमश करने की विनंती कोर्ट में की है जिसका फैसला फरवरी तक आ जायेगा.

शबनम को फाँसी मिलने की वजह :

उत्तर प्रदेश (uttar pradesh) के मुरादाबाद शहर में बावनखेड गाँव में रहने वाली शबनम, एक Well Educated फॅमिली से belong करती थी, उसके पिता स्कूल में टीचर थे, खुद शबनम ने डबल M.A. किया था, इंलिश टीचर थी, शबनम के स्कूल, कॉलेज फ्रेंड्स के मुताबिक, शबनम ( shabnam) काफ़ी helping nature की लड़की थी, वो सभी को हेल्प करती थी, कई लोगों की तो उसने कॉलेज की fees भी भरी थी, पढ़ने में काफ़ी तेज़ और सुलझी हुई लड़की थी, फिर ऐसा क्या हुआ की उसके जिंदगी आज ये मुकाम आया?

कहा जाता है की, सलीम नाम के लड़के से शबनम प्यार करती थी, जो की शबनम के मुकाबले ना वो पढ़ा लिखा था, ना ही उसकी आर्थिक हालात अच्छे थे, Inshort शबनम (shabnam) और सलीम के हालातों में काफ़ी फर्क था, पर प्यार करनेवालों के लिए ये सारी बातें मायने नहीं रखती, वो शादी करने की सोच रहे थे, पर शबनम के घरवालों को ये रिश्ता मंजूर नहीं था, उसने अपने परिवार को मनाने की कोशिशें की पर उसे सहमति नहीं मिली, पर फिर भी शबनम को लगा होगा की एक ना एक दिन तो उसकी फॅमिली मान जाएगी तो शायद इसीलिए उसने अपने रिश्तें को कायम रखा, and in between that she consumed a baby from that relationship, वो माँ बनने वाली थी, शायद इसी वजह से वो डर गयी होगी की, how she will face her family?

इसी डर ने शबनम को ये फैसला लेने के लिये मजबूर किया होगा, किसीकी जान लेने का, कहते है प्यार अंधा होता है, पर किस हद तक अंधा हो सकता है, इस बात की साक्षी ये 14 अप्रैल 2008 के रात बावनखेड़ी गाँव में घटीं घटना देती हैं.

हत्याकांड :-

14 अप्रैल 2008 की  रात को रात को एक घर में सात लोगों की लाशें बिछी मिलती हैं, जिसकी खबर एक पडोसी पुलिस को करता हैं, पुलिस वारदात पर पहुंचते हैं,और देखतें हैं एक ही परिवार की लाशें बिखरी पड़ी हैं और एक लड़की चीख-चीखकर रो रही हैं, वो लड़की उस घर की बेटी (शबनम) रहती हैं, उसे उस हालत में देखकर पुलिस ज्यादा पूछताछ नहीं करती हैं पर formalities के लिये जब शबनम से पूछती हैं तो वो बताती हैं की कुछ लोग छत से घर पर आये और उन्होंने कुरहाड़ि से उसके परिवार के सारे लोगों को मार दिया, पुलिस को शक तो तभी होता हैं क्योंकि उस घर ki दिवार ऐसी नहीं थी की उससे कोई चढ़कर अंदर आये और गेट भी इतना मजबूत की उसे कोई तोड़ नहीं पाये और अगर कोई उस परिवार को मरना चाहता तो शबनम कैसे बची?

ऐसे ही कई सवाल पुलिस के सामने थे. शबनम के प्रति लोगों में हमदर्दी और पुलिस के प्रति आक्रोश था, कई अफसरों का तो तबादला भी हुआ था, जैसे ही इस घटना की खबर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती को पता चलती हैं तो वो वहा आती हैं और शबनम को मुआवजा देने का ऐलान करती है.

पुलिस अधिकारीयों की कामयाबी :-

जनता में पुलिस के प्रति आक्रोश को देखकर तत्कालीन इंस्पेक्टर बाबूराम सागर की जगह सेवानिवृत इंस्पेक्टर आरपी गुप्ता को ये केस सौप दिया गया, कई तख्तों को देखकर पुलिस का शक शबनम पर बढ़ने लगा, और उन्होंने मुख्यमंत्री से आवेदन किया की शबनम को अभी मुआवजा ना दे, काफ़ी मिन्नतें करने के बाद पुलिस को 48 घंटो का समय दिया गया और उस टाइम के लिया मुआवजा की घोषणा रोख दी गई.

और इन्हीं 48 घंटों में पूरा मामला सामने आ गया, जो कोई ख़्वाबों में भी नहीं सोच नहीं सकता ऐसा, जाँच के दौरान जब शबनम के कॉल डिटेल्स देखें गये तो उसी दिन करीब 50 से ज्यादा कॉल किये गये थे और वो घटना के कुछ देर पहले और कुछ देर बाद, जब की पुलिस को भी पडोसी ने बुलाया था, वो सारे कॉल शबनम द्वारा सलीम को किये गये थे, उन दोनों ने मिलकर इस घटना को अंजाम दिया दिया था, उन्हें पहले जहर देकर मारा गया और फिर कुरहाड़ि से वार किये गये, सात माह के बच्चे को गला घोटकर मारा गया, शबनम के माता-पिता, दो भाई, भाभी सबको मार दिया, ये सारी बातें  पहले सलीम ने बताई जब पुलिस ने उससे अपने अंदाज़ पूछताछ की और शबनम ने भी ये कड़वा सच बयाँ किया.

फिर केस कोर्ट में पेश हुआ, बिना सबूत-गवाहों के इतनी जल्दी केस का खुलासा करने के लिये जिला जज ने तत्कालीन इंस्पेक्टर आरपी गुप्ता को सराहा और उन्हें प्रशस्ति पत्र भी दिया.

Court decision :-
उत्तर प्रदेश के शबनम की कहानी
                       उत्तर प्रदेश के शबनम की कहानी

लोअर कोर्ट ने परिवार को मारने के इल्जाम में शबनम और सलीम को फाँसी की सजा सुनाई, इसी फैसले की पुष्टि higher court, सुप्रीम कोर्ट ने भी की, यहाँ तक की राष्ट्रपति ने भी दया याचिका को ख़ारिज करते हुए उसकी फाँसी की सजा बरकरार रखी, पिछले 11 साल से शबनम मुरादाबाद के और सलीम आग्रा के जेल में रह रहे है, पर अभी कुछ दिनों पहले अपने उस बच्चे की दुहाई देते हुए जिसे उसका फ्रेंड संभालता है, शबनम ने सुप्रीम कोर्ट में रिव्‍यू पेटिशन फ़ाइल की है, संभव है की उसका फैसला फ़रवरी में आ जाये.

अगर यहाँ पर भी उसी फैसले को बरकरार रखा जाता है तो शबनम  “भारत”  की पहली महिला होगी जिसे फाँसी दी जायेगी, अगर इतिहास बनाना ही है तो किसी अच्छे काम का बनाओ, जिससे कोई कुछ सिख सके, ऐसा इतिहास बनाकर क्या फायदा जिससे लोगों के दिल में हमेशा के लिये नफरत रहे.

कहते हैं प्यार से तो पत्थर भी पिघलायें जाते हैं फिर हम तो इंसान हैं, इस खून-ख़राबें में यार रखा क्या हैं.

प्यार दो, प्यार लो और खुश रहो 

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आप क्या  सोचते हो रिव्यु पेटिशन का क्या होगा नतीजा, क्या शबनम( shabnam ) और सलीम की फाँसी की सजा बरकरार रहेगी या बदल जायेगा फैसला, comment में जरूर बताना.