भक्ति(devotion) की महिमा

Devotional

भगवदगीता में एक श्लोक है, जिसका आशय है कि ‘सब धर्मों का परित्याग कर तू मेरी शरण में आ जा। मैं तुझे सब पापों से मुक्त कर दूंगा।’ यह कथन भगवान श्री कृष्ण का है, जो भक्ति (devotion) की महिमा स्पष्ट करता है।

भक्ति(devotion) वह पवन गंगा है, जिसमे डुबकी लगाने वाला अपने पापों से मुक्त हो सकता है। स्वयं को पवित्र कर सकता है-भक्ति(devotion) की गंगा में डुबकी लगाकर।त्रिगुणमयी माया का प्रभाव और कुछ पूर्व जन्म के संस्कार मिलकर हमारे कर्मो के प्रेरक तत्वों को प्रभावित कर असत्य या अनैतिक कर्म करने की ओर प्रवृत्ति करते हैं। काम,क्रोध, लाभ जैसे विकारों से ग्रस्त होकर मानव असत्य की राह पर चला जाता हैं। वहीं इस कृपा से मानव जब प्रायश्चित कर भक्ति की राह पर चलता है तो अनन्य भक्ति(devotion) गंगा बहने लगती हैं। धीरे-धीरे मैल धुलने लगते है।आत्मा स्वच्छ हो उठती हैं। ईश्वर दयालु है। वह पश्चयताप करने पर अतीत के दुष्कर्मो को माफ कर देता हैं,बशर्ते व्यक्ति अंतर्मन में यह संकल्प लें कि आगे से वह अनैतिक कर्म नहीं करेगा।

ध्रुव या प्रहलाद ने या जिसने भी ईश्वर को पाया, अनन्य भक्ति से ही पाया।

भक्त रैदास भक्ति द्वारा ही ईश प्रिय बने। भक्ति (devotion) के कई मार्ग है ज्ञान मार्ग, आत्म चिंतन, सत्संग और योग साधना। भक्ति प्रेम रहित हो ही नहीं सकती। प्रेम व्हलता भक्ति में ईश्वर का अहसास कराती हैं। कुछ ऐसे विलक्षण आते हैं कि ईश्वर और जीव में कोई भेद नहीं रहता।