ये है मेरे दर्द की जुबान

sad poetry

मेरे दर्द की अब जुबान हो गई है।

मेरे हौसलों की अब पहचान हो गई है।

अपनी पहचान को मैं कैसे बनाऊं मुकद्दर.

मेरे रहबरों के रास्ते अब अंजान हो गई है।

 pronounced my pain

 

अक्षरों को कैसे हमसे पहचान हो गई है।

हर लफ्ज़ पर आज उनकी नीमजान हो गई है।

उस नीमजान को मैं कैसे बनाऊं मुकद्दर।

मेरे रहबरों के रास्ते अब अनजान हो गई हैं।

दिलों में दिल की टूटी दरारों की रुझान हो गई है।

उभरती मेरे सीने में एक अजनबी दर्द पहचान हो गई है।

इस पहचान को समेटे में जी रहा हूं अक्सर।

मेरे रहबरों के रास्ते अब अनजान हो गई है।

अवधेश कुमार राय अवध

धनबाद