भीड़ तंत्र से हारता लोकतंत्र।

हम दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने पर गर्व महसूस करते हैं लेकिन जब लोकतंत्र करने वाले लोग ही भीड़ की शक्ल में किसी का घर उजाड़ ते हैं तो ड्यूटी कर रहे हैं। अफसर की हत्या करने से भी नहीं सकते और अपना रुतबा तो खाते हुए बूढ़े और बच्चियों को नोच डालते हैं तो यह ग्रुप और गर्व पल पल में चूर होता रहता है।

जब हम आजादी की बात करते हैं तो आजादी में सबसे पहले नंबर भारत का आता है जिसमें हर तरीके की आजादी उपलब्ध है। लेकिन दुख कभी कभी इस बात का होता है की भीड़ तंत्र अपनी मर्यादा भूल जाता है। शायद देश का किसी कोने से यह खबरें ना मिलती हो की भीड़ का आतंक कहर बनी भी गुस्साई भीड़ ने की तोड़फोड़ भीड़ ने के लोगों की हत्या बेशक लोकतंत्र की ताकत से ही लोकतंत्र चलता है।

लेकिन लोगों का खूब होना कामयाब लोकतंत्र की निशानी है लेकिन लोकतंत्र की आजादी और हक के नाम पर कानून हाथ में लेना और अपराध को अधिकार समझ लेना भीड़ का दुस्साहस माना जाना चाहिए भीड़ जब बेखौफ होकर कानून अपने हाथ में लेने लगे तो यह लोकतंत्र नहीं रह जाता है। इस अराजकता अनुशासनहीनता कहा जाता है यह हमारे लिए बेहद शर्म और अफसोस की बात है।

 

कि हम एक तरफ खुद को तहजीब और मर्यादाओं का सबसे बड़ा मुकाम बताते हैं। लेकिन ठीक उसी पर इस देश में कहीं ना कहीं इन मूल्यों और सिद्धांतों की बखिया उधेड़ ई जा रही होती है। इस वर्ष दो दर्जन से ज्यादा ऐसी घटनाएं हुई हैं जिनमें भीड़ ने अपने हाथ में कानून लेकर कई लोगों की हत्या कर डाली है। हमारे को स्वर्ग का कारण है जिसे हम अपने प्रतिनिधित्व के लिए चुनते हैं।

 

राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव है कि हाथों में हथियार लिए खड़े जवानों पर आतंकी बेखौफ होकर पत्थर बरसाते हैं। बात सिर्फ यहीं खत्म नहीं होती यह हिमाकत एक ऑन ड्यूटी पुलिस अधिकारी की हत्या तक पहुंच जाती है। आखिर में सर्वोच्च न्यायालय को सरकार से यह कहना पड़ता है कि वो लिंचिंग के खिलाफ संसद कानून बनाया जाए सर्वोच्च न्यायालय का यह आदेश हमारे लोकतंत्र की हालत और समाज के दोहरे चेहरे को दिखाता है हमें यह सबक लेने की जरूरत है कि लोकतंत्र लोकतंत्र ही बना रहे यह भीड़ तंत्र ना बने।