अगर नहीं बनाया गया environmental balance पर्यावरण संतुलन तो खत्म हो जाएगी सारी धरती

environmental balance

Create environmental balance पर्यावरण संतुलन तो खत्म हो जाएगी सारी धरती।

वर्ष 2018 को अलविदा कहने और वर्ष 2019 के स्वागत करने के बीच की कड़ियां जुड़ी है इनमें राजनीतिक आर्थिक व पर्यावरणीय सभी तरह की हलचल है। यह साल एक तरफ जहां 8 राज्यों के राजनीतिक परिदृश्य को लेकर चर्चा में रहा। वहीं जीडीपी वर्ष के अंत में कुछ इस तरह रिजर्व बैंक चर्चा में रहा तो रफेल की बहस भी चाहे करती रही इन हलचल ओं के बीच देश दुनिया का बिगड़ता हुआ पर्यावरण कुछ खास और क्या नहीं बटोर पाया देश के नीति कारोबा राजनेताओं के लिए यह गूढ़ विषय है। बावजूद इसके इस बार कई बड़ी पर्यावरणीय घटनाएं हुई जो हमसे गंभीरता की अपेक्षा करती है अगर इस साल पर्यावरण की समीक्षा की जाए तो आने वाले समय के लिए हालात बेहतर नहीं कहे जा सकते। यह साल भीषण पवन दलों का रहा गर्मियों में अनायास तापमान में बढ़ोतरी हुई और बवंडर ने जान माल का नुकसान किया यह सिलसिला अब रुकेगा नहीं इसका कारण यह है।

 

environmental balance  न बनने की वजह से बढ़ रही है मुसीबत

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी जलवायु परिवर्तन को लेकर गंभीरता ना होने के कारण परिस्थितियां बिगड़ने लगी हैं। इसी साल हवाई के मोहल्ला दुआ और बैटरी के अनुसार आज तक वायुमंडलीय कार्बन डाइऑक्साइड 410 डीपीएस जो अब तक की सबसे ज्यादा है। बढ़ते प्रदूषण को देखते हुए तापमान का कारण सी र प्रभावित होता है और भारत इसमें एक कदम भी पीछे नहीं है क्योंकि यहां औसतन पीएम बेलो 200 से 400 के बीच है। प्रदूषण तापमान का अंतर पैदा और उस में खलल डालता है। और गुंडों को आमंत्रित करता है उत्तर भारत बा राजस्थान में बवंडर से डेढ़ सौ से ज्यादा लोगों की मौत हुई इससे ज्यादा घायल हुआ है। इस वर्ष मानसून ने भी काफी कहर ढाया पहाड़ से लेकर साउथ इंडिया के राज्यों तक कहर ढाया नेशनल एमरजैंसी रिस्पांस सेंटर के अनुसार पश्चिम बंगाल में 171 उत्तर प्रदेश में 170 आसाम में 45 गुजरात में 23 नागालैंड में 8 लोगों की मौत हुई महाराष्ट्र के 26 आज शाम के 23:00 लोग घायल हुए केरल तो जैसे पूरी तरह डूब ही गया था सदी की सबसे बड़ी बाढ़ ने केरल की आर्थिक सामाजिक परिस्थिति को ही हिला दिया।

 

environmental balance की वजह से बढ़ रहा हे प्रदूशण

इसमें 490 लोगों की मौत हुई लगभग 10 लोगों को विस्थापित करना पड़ा जो आबादी का लगभग छठा हिस्सा था यही नहीं वहां बांध बड़े खतरे की सीमा तक पहुंच गए थे। जो करीब दो हजार करोड़ का सीधा नुकसान हुआ पहाड़ी राज्यों ने भी इस साल मानसून में बड़ा नुकसान झेला इस साल बादल फटने से 35 और भूस्खलन से 392 घटनाएं लगभग 265 लोगों की जान गई करीब 1217 करोड़ का नुकसान आंका गया। इस बार का मानसून सबसे विनाशकारी और भयंकर था यह जलवायु परिवर्तन की ओर ही इशारा कर रहा है। इस साल वायु प्रदूषण के आंकड़े बहुत ही घातक थे दिल्ली हो या देहरादून कानपुर हो या मथुरा सभी जगहों पर प्रदूषण ने दम घुटने की कोशिश की इसी साल दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में भारत के 14 शहर पाए गए डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट के अनुसार भारत में बढ़ते प्रदूषण पर चिंता जताई गई।

 

है इस साल देश के 8 राज्यों में चुनाव हुए लेकिन विडंबना यह रही इन चुनावों में ना तो राजनेताओं ने ना ही उनके दोनों ने इन मुद्दे को उठाने की कोशिश राजनीतिक पार्टी घोषणा पत्र वही पुराने ढर्रे पर बनाए गए थे किसी भी राजनीतिक दल को हवा मिट्टी पानी और बिगड़ती हालत सुधारने से कुछ लेना-देना नहीं था राजनीतिक दल उन्हीं मुद्दों को घोषणा पत्र का हिस्सा बनाते हैं जिसमें उनसे वोट मिल सकें कर्जमाफी ढांचागत विकास रोजगार जैसे मुद्दे घोषणा पत्रों के मुख्य अंग हैं पर जान और जीवन से जुड़े सवाल कभी भी राजनेताओं के संकल्पों और घोषणा पत्रों का हिस्सा नहीं बन पाए यह समझ ही नहीं आ रहा।

 

कि दुनिया की धरती के आधार जंगल मिट्टी हवा और पानी इनकी बेहतरी ही अर्थव्यवस्था को स्थिर रख सकती है बेहतर जंगल पानी की व्यवस्था किसानों की खेती में लागत को आधा कर सकती है। देश में पहले ज्यादा खेती वर्षा के पानी बन आश्रित धनगर पालन पर आधारित थी लेकिन अब ट्यूबवेल और रासायनिक खादो पर है। जिसमें खेती में लागत कई गुना बढ़ गई है यही कारण है

आज की ऊंची लागत वाली खेती प्रतिफल किसानों को परिश्रम से कई गुना कम दाम देती है लिया हुआ कर्ज किसानों को मात्र सहारा देता है। उनके उत्पादन में चमत्कारी बढ़ोतरी नहीं कर पाता दूसरी तरफ देश के बड़े उद्योगों में पानी की बढ़ती खपत जिसमें बोतल का पानी भी शामिल है। जल चक्र को प्रभावित किया है इससे उद्योगों पर हमने ना तो कोई प्रतिबंध लगाया है और ना ही भरपाई की शर्तें रखी परिस्थिति अगर राजनीतिक दलों और घोषणाओं पदों का हिस्सा होती तो इसमें बड़ा दोष आम आदमी का भी है। हमने कभी पर्यावरण के लिए बड़े आंदोलन नहीं किए जो राजनीतिज्ञों और उनके दलों को इस मुद्दे पर गंभीर बनाते हैं हमारे देश की राजनीतिक शैली तो यही सिखाती है कि जो मुद्दे जनता के होंगे वही राजनेताओं के सुरता हो जाते हैं लेकिन वे उन्हीं केंद्रों में रखकर अपने अपने दल के लिए वोट जुटाने दिखाई देते हैं यही कारण है इनके घोषणा पत्रों पूरी तरह पर्यावरण रहित होते हैं।