किसान कर्जमाफी या चुनावी चाल ?

debt waiver

राजनीति दलों के लिए किसान एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे है बस दिक्कत इस बात की है कि वे सभी राजनीतिक पार्टियों को चुनावी समय में ही याद आते है।मध्यप्रदेश,राजस्थान, छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने किसानों से किया चुनावी वादा महज़ 2 दिनों में पूरा कर विपक्ष को पटरी पर ला दिया है।

अब समस्या इस बात की है कि क्या किसानों की कर्जमाफी(debt waiver) से किसानों का भला होगा या नहीं, क्योंकि जो किसान वास्तव मे कर्जमाफी का हकदार होता है वो तो इससे वंचित रह जाता हैं। इसका उदाहरण 2017 में उत्तरप्रदेश में हुई 36 हज़ार करोड़ रुपए की कर्जमाफी हैं।

वास्तव मे किसानों की कर्जमाफी(debt waiver) चुनावी वादा बनकर रह गई है दावा ये भी किया जा रहा है कि केंद्र सरकार चुनावो से पहले देश के सभी किसानों का 4.5 लाख करोड़ रुपए का ऋण माफ करने पर विचार कर रही हैं ,अगर ऐसा होता है तो देश की अर्थव्यवस्था पर इसका बहुत विपरीत प्रभाव देखने को मिल सकता हैं।

ये भी पढ़े : किसानों के मुद्दों पर बन्द हो राजनीति, मुद्दे को राजनीतिक रंग दिया जा रहा है

यानि की सरकार अपने को सत्ता में लाने के लिए जो भी ऐसे वादे करते हे इससे किसानो को तो लुभाकर वोट अपने नाम करते हे.उसी वादो को पूरा करने के लिए सरकार अपनी जेब से पैसे नहीं देते दरहसल सरकार किसी और का हक़ छीन कर किसानो को देगी तो इससे तो सामान्य वर्ग पर बहोत भारी बोज पड़ सकता हे।