सरकारों की लड़ाई में बेहाल दिल्ली और दिल्लीवाले

लगभग पिछले 4 सालों से दिल्ली के मिज़ाज बिलकुल बदलते ही जा रहे हैं केंद्र और राज्य सरकार की लड़ाई में दिल्ली के हाल बेहाल हैं।कभी सफाइकर्मचारियों की सैलरी नही दी जाती,तो कभी दिल्ली सरकार आरोप लगाती है कि उपराज्यपाल उनसे मिलने को तैयार नही होते ,तो कभी ये आरोप की पुलिस ने दिल्ली सरकार की कोई भी बात नही सुनती क्योंकि दिल्ली पुलिस भाजपा के अंडर आती है ।

सफाइकर्मचारियों की सैलरी समय से न देने के कारण वे लोग हड़ताल पर चले जाते हैं और उनके हड़ताल पर जाने से दिल्ली में जगह-जगह पर कूड़े के ढेर लग जाते हैं।जिस से न जाने कितनी जानलेवा बीमारियों का खतरा दिल्लीवालों के सिर पर मंडराने लगता है। केंद्र सरकार कहती है ये हमारी जिम्मेदारी नही है और दिल्ली सरकार भी इस से मुँह फेरती दिखाई देती है। अंततः कोर्ट को इन दोनों सरकारों की लड़ाई के मध्य पिस रही जनता के लिए फैसला सुनाना पड़ता है। ऐसा एक बार नही बल्कि पिछले तीन-चार सालों से बार – बार हो रहा है । आयुष्मान भारत योजना को भी दिल्ली में लागू करने से दिल्ली सरकार ने मना कर दिया। जिस कारण न जाने दिल्ली के कितने ही गरीब परिवार भारतवासी होते हुए भी इस भारतीय योजना के लाभ से वंछित रह गए ।

इसी प्रकार केंद्र सरकार द्वारा पेट्रोल के दाम घटने पर भी दिल्ली सरकार से सहयोग प्राप्त न होने पर दिल्ली में उ.प्र.और अन्य राज्यों के मुकाबले पेट्रोल ज्यादा महंगा था जिसके कारण आम आदमी की जेब से अधिक पैसा खर्च हो रहा था।

सरकारों की आपसी तनातनी में जनता के हितों की ओर कोई ध्यान देने को तैयार नहीं है।क्या यह सजा दिल्लीवासियों को सिर्फ इसलिए मिल रही है कि उन्होंने अलग-अलग सरकारों को चुना है।आखिर कब हमारे देश की सरकारें अपने स्वयं के हितों को छोड़ जनता के हितों के विषय में सोचना प्रारम्भ करेंगी।

सौरभ शुक्ला

Saurabhdsj@gmail.com

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